चुनक ऋषि और मानधाता चक्रवर्ती सम्राट


एक मानधाता चक्रवर्ती राजा था  उसका पूरी पृथ्वी पर राज्य था। उसने अपने राज्य में यह जाँचना चाहा कि क्या पृथ्वी के अन्य राजा जो मेरे आधीन हैं। या उनमें से कोई स्वतन्त्र होना चाहता है?  
इसलिए राजा ने अपने निजी घोड़े के गले में एक पत्र लिखकर बाँध दिया कि जिस किसी राजा को मानधाता राजा की पराधीनता स्वीकार न हो, वह इस घोड़े को पकड़ ले और युद्ध के लिए तैयार हो जाए, राजा के पास 72 अक्षौणी सेना है।
 उस घोड़े के साथ सैंकड़ों सैनिक भी चले। सारी पृथ्वी पर चक्कर लगाया। किसी राजा ने उस घोड़े को नहीं पकड़ा। इससे स्पष्ट हो गया कि पूरी पृथ्वी के छोटे राजा अपने चक्रवर्ती शासक मानधाता के आधीन है।
 सर्व सैनिक जो घोड़े के साथ थे, खुशी से वापिस आ रहे थे। रास्ते में ऋषि चुणक की कुटिया थी। चुणक ऋषि ने सैनिकों से पूछा जो घोड़ों पर सवार थे कि हे सैनिको! कहाँ गए थे? इरा घोड़े का सवार कहाँ गया? सैनिकों ने ऋषि जी को सर्व वात बताई। 
ऋषि ने कहा क्या किसी ने राजा मानधाता का युद्ध नहीं स्वीकारा? सैनिक बोले कि है किसी की बाजुओं में दम, पिलाया है किसी माता ने दूध जो हमारे राजा के साथ युद्ध कर ले। राजा के पास 72 अक्षौणी अर्थात् 72 करोड़ सेना है। जॉड़ तोड़ देंगे यदि किसी ने युद्ध करने की हिम्मत की तो ऋषि चुणक जो काल ब्रह्म का पुजारी था ने कहा कि हे सैनिको! आपके राजा का युद्ध मैंने स्वीकार कर लिया, यह घोड़ा बाँध दो मेरी कुटिया वाले वृक्ष से। सैनिक बोले कि हे कंगले! तेरे पास दाने तो खाने को नहीं है, क्या युद्ध करेगा तू राजा मानधाता के साथ? अपनी भक्ति कर ले, क्यों श्यात् बोल दे रही है तेरी अर्थात् तेरी क्यों सामत आई है? ऋषि ने कहा, जो होगा सो देखा जाएगा। 
जाओ, कह दो तुम्हारे राजा को कि तुम्हारा युद्ध चुणक ऋषि ने स्वीकार कर लिया है। राजा को पता चला तो सोचा कि आज एक कंगाल सिरफिरे ऋषि की हिम्मत हुई है, कल कोई अन्य हिम्मत करेगा बुराई को प्रारम्भ में ही समाप्त कर देना चाहिए। 
जनता को भयभीत करने के लिए एक व्यक्ति को मारने के लिए राजा ने 72 करोड़ सेना की चार टुकड़ियों बनाई। एक टुकड़ी 18 करोड़ सैनिक पहले भेजे ऋषि से युद्ध करने के लिए। काल ब्रह्म के पुजारी चुणक ऋषि ने सिद्धि शक्ति से चार पुतलियों बनाई अर्थात् चार परमाणु बम्ब तैयार किए। 
एक पुतली छोड़ी, उसने 18 करोड़ सेना को काट डाला। राजा ने दूसरी टुकड़ी भेजी। ऋषि ने दूसरी पुतली छोड़ी। इस प्रकार राजा मानधाता की 72 क्षोणी सेना का नाश काल ब्रह्म के पुजारी चुणक ने कर दिया। विचार करें :- ऋषि-महर्षियों को राजाओं के बीच में टाँग नहीं अड़ानी चाहिए। कारण यह है कि ऋषिजनों ने हजारों वर्ष ॐ नाम का जाप किया परमात्मा प्राप्ति के लिए।
 परमात्मा मिला नहीं क्योंकि गीता अध्याय 11 श्लोक 47. 48 में लिखा है कि वेदों में (चारों वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद) वर्णित भक्ति विधि से ब्रह्म प्राप्ति नहीं है। इसलिए इससे ऋषियों में सिद्धियां प्रकट हो जाती हैं। अज्ञानता के कारण उसी भूल-भुलइया को ये भक्ति की उपलब्धि मान बैठे।
 जिस कारण से भक्ति करके भी उस पद को नहीं प्राप्त कर सके. जहाँ जाने के पश्चात् पुनः जन्म नहीं होता क्योंकि इनको तत्वदर्शी सन्त नहीं मिले। 
सूक्ष्म वेद में कहा कि : कबीर, गुरू बिन काहू न पाया ज्ञाना, ज्यों थोथा भुस छड़े मूढ़ किसाना।
 गुरु बिन वेद पढ़े जो प्राणी, समझे न सार रहे अज्ञानी ।। 
गरीब, बहतर क्षौणी खा गया, चुणक ऋषिश्वर एक । देह धारें जौरा फिरें, सबही काल के भेष ।।




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