राजा अंबरीष सतयुग में हुए थे। वे पिछले जन्मों में कबीर परमेश्वर के भक्त रहे हुए थे। अपने विधान अनुसार परमात्मा अपने भक्तों को समय-समय पर भक्ति की प्रेरणा देता है तथा सहायता करता है।
वही आत्मा त्रेतायुग में राजा जनक हुए जो सीता जी के पिता थे। वही राजा अंबरीष व राजा जनक वाली आत्मा कलयुग में श्री नानक देव (सिख धर्म प्रर्वतक) हुए। राजा अंबरीष के ईष्ट देव श्री विष्णु जी थे। किसी गुरू जी से दीक्षा लेकर साधना करते थे। राजा अंबरीष भक्ति को प्राथमिकता देते थे। उसके लिए अन्न-जल का संयम रखते थे कि मन भक्ति में लगे। भक्त अंबरीष ने महीने के आहार का नियम बना रखा था। वे प्रतिदिन एक रोटी कम खाते थे। उस समय मानव शरीर लंबा-चौड़ा होता था। मानव की लंबाई सौ फुट के आसपास होती थी। इसके अनुसार मोटाई भी अधिक होती थी। भोजन की खुराक भी अधिक होती थी। गुरू जी ने एकादशी (ग्यारस) का व्रत रखना भी भक्ति कर्म बता रखा था। अंबरीस को वेद ज्ञान भी था। उनकी आत्मा मानती थी कि व्रत रखना वेद में नहीं लिखा है। गुरू को भी
नाराज नहीं करना चाहा। इसलिए अपने आहार को इस प्रकार नियमित किया कि एकादशी को भोजन न करना पड़े। जैसे एक दिन में पेट भरने के लिए सामान्य तौर पर ग्यारह रोटी भोजन करते थे तो उसको प्रतिदिन इस तरह कम करते थे कि एकादशी को बिल्कुल न खाना पड़े। जैसे कृष्ण पक्ष की अमावस्या को रोटी व अन्य सब्जी खाते थे तो प्रतिदिन एक रोटी व उसी अनुसार सब्जी भी कम कर देते थे। तो एकादशी को कुछ नहीं खाते थे। फिर इसी तरह प्रतिदिन एक-एक रोटी बढ़ाते थे। यह प्रति महीने का क्रम था।
एक बार एकादशी को ऋषि दुर्वासा जी, राजा अंबरीष जी के दरबार में आए। राजा ने ऋषि जी का आदर-सत्कार किया। भोजन के लिए निवेदन किया। ऋषि दुर्वासा ने कहा
कि भोजन तैयार करवाओ। तब तक मैं दरिया पर स्नान करके आता हूँ। ऋषि जी को लौटने में देरी हो गई। राजा अंबरीष के गुरूजी ने राजा को व्रत समापन करने को कहा।
अंबरीष ने विचार किया कि ऋषि दुर्वासा के आने पर ही जल आचमन करूँगा। परंतु ऋषि नहीं आए। गुरू जी ने एकादशी समाप्त होने से पहले जल का आचमन अंबरीष को करवा दिया। ऋषि दुर्वासा लौटे तो अंबरीष से कहा कि आप भी हमारे साथ बैठकर खाना खाओ। अंबरीष ने सब बात बताई कि आज मेरा एकादशी का व्रत था। एकादशी आज के दिन ग्यारह बजे समाप्त हो गई है। इससे पहले एकादशी के व्रत को समापन करना अनिवार्य था। मैंने जो खाना था, खा लिया। अब आज कुछ नहीं खाना है। ऋषि दुर्वासा तो क्रोध से भरे रहते थे। अंबरीष से कहा कि तेरे घर पर ऋषि आए हैं। तूने ऋषियों से पहले भोजन करके
हमारा अपमान किया है। यह कहकर ऋषि ने राजा को उपदेश दिया कि यह कर्म-काण्ड वेद विरूद्ध है। इसे नहीं करना चाहिए, व्यर्थ है। राजा ने कहा जो आपकी आज्ञा। ऋषि दुर्वासा बिना आहार किए ही चला गया।
अगली बार भी दुर्वासा जान-बूझकर एकादशी को
आया। राजा ने उसी तरह एकादशी का व्रत समापन किया। ऋषि जान-बूझकर उस दिन और देर से स्नान करके आए। खाने के समय राजा के साथ बैठकर भोजन करने का आदेश दिया। राजा ने वही विवशता बताई कि मैंने एकादशी के व्रत का समय पर उद्यापन करना पड़ा। आज भोजन नहीं खा सकता, क्षमा करो। आप भोग लगाओ और हमें कृतार्थ करो। यह उत्तर राजा का सुनकर ऋषि दुर्वासा आग-बबूला होकर बोला, मैंने तुझे एकादशी का व्रत न रखने को कहा था। आपने मेरा अपमान किया है। राजा ने कहा कि ऋषि जी! मैं व्रत नहीं रखता। यह तो अन्न-जल का संयम बनाकर साधना करता हूँ।
#दुर्वासा ऋषि ने राजा अंबरीष पर अपनी बात नहीं मानने पर क्रोध में आकर सुदर्शन चक्र छोड़ दिया तो #सुदर्शन ने राजा अंबरीष के चरण छूकर दुर्वासा को मारने के लिए दौड़ पड़ा। दुर्वासा जी ने रोकना चाहा पर नहीं रुका। अपनी जान बचाने के लिए दुर्वासा सर्वप्रथम #शंकर और ब्रह्मा जी के पास गए उन्होंने रोकने की कोशिश की पर सुदर्शन के तीव्र वेग को शांत नहीं कर पाए। तब ब्रह्मा जी ने विष्णु जी के पास जाने की सलाह दी। मरता क्या नहीं करता, दुर्वासा जी #विष्णु लोक की तरफ तेजी से उड़ चले। पीछे-पीछे सुदर्शन आग की लपटें छोड़ते हुए उग्र वेग से चल रहा था।
इसी बीच पूर्ण परमेश्वर #कबीर साहिब जी ने स्वयं #विष्णु रूप में प्रकट होकर विष्णु जी की सभा स्थल से 10 योजन (120किमी) दूर 33 करोड़ देवताओं सहित लीला रूप में एक सभा लगा ली। परमात्मा जानते थे कि #सुदर्शन को विष्णु जी भी नहीं रोक पायेगा और अपने भक्त की महिमा भी बनानी थी।
तभी दुर्वासा जी परमात्मा के दरबार में दौड़ कर गए और अपनी जान की भीख मांगी। तब समर्थ #परमात्मा (विष्णु रूप में प्रकट) ने सुदर्शन चक्र की उग्रता देखी और अपना आसन छोड़कर दुर्वासा की रक्षा के लिए उठे। विचार किया कि यदि बचाव नहीं किया तो सुदर्शन ऋषि के टुकड़े-टुकड़े कर मार डालेगा।
#परमात्मा ने दुर्वासाको वचन कहे कि ऋषि जी आप ज्ञानहीन हो, महिमा के भूखे हो। अंबरीष के दरबार में झगड़ा क्यों किया? राजा अंबरीष तो पूर्ण रूप से मेरे पर समर्पित है। #सत्य वक्ता है। उसे #निर्गुण और #सर्गुण दोनों प्रकार की साधना का ज्ञान है। आपने भक्त अंबरीश के साथ द्रोह किया है। जो मेरे भक्तों का द्रोही होता है उसका मुंह काला होता है। शीघ्र अंबरीष के दरबार में जाकर उनके चरणों में गिरो, क्षमा मांगो। वह क्षमा करेगा तभी सुदर्शन शान्त होगा।
मरता क्या न करता, विचार किया कि मेरी ही (चूक) गलती पाई। सुदर्शन चक्र पीछा नहीं छोड़ रहा है। अब तो राजा अंबरीष ही पीछा छुड़ाएगा वही जीवन दान देगा।
दुर्वासा ने राजा अंबरीष के दरबार में जाकर चरणों में गिरकर माफी अपनी मानी, क्षमा मांगी। राजा अंबरीष बोले कि ऋषि जी मैंने कुछ नहीं किया, आपने जैसा किया उसी का फल मिला है। राजा ने सुदर्शन पकड़कर उसे पकड़ा दिया। बोले कि ले तेरी मिसाइल, फिर गलती न करना।
तब श्री कृष्ण के गुरु ऋषि दुर्वासा जी के जान में जान आई। अंबरीष ने कहा कि ऋषि जी #भक्ति भाव से रहा करो मान-बड़ाई में जीवन नष्ट न करो।
"श्री कृष्ण गुरु कसनी हुई, और बचेगा कौन?"
जब श्री कृष्ण जी के गुरु दुर्वासा जैसे ऋषियों की ये हालत है तो फिर आम आदमी कैसे बच सकता है ?
पूर्ण परमेश्वर का #साधक ही काल के जाल से बच सकता है। इस समय 7 अरब आबादी के अंदर एक ही पूर्ण गुरु है। जो कबीर परमेश्वर जी की सत साधना बताते है। यह मनुष्य जन्म बारबार नहीं मिलता। सभी से विनम्र निवेदन है कि आप सभी अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लेवें और अपना कल्याण कराएं।
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